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महाराणा प्रताप जयंती 17 जून 2026: जानें क्यों, कब से और कैसे मनाई जाती है यह जयंती — वीर योद्धा की पूरी कहानी हिंदी में

On: June 17, 2026 10:04 AM
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महाराणा प्रताप जयंती 17 जून 2026: जानें क्यों, कब से और कैसे मनाई जाती है यह जयंती — वीर योद्धा की पूरी कहानी हिंदी में
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आज 17 जून 2026 को पूरा देश महाराणा प्रताप जयंती मना रहा है। यह जयंती हर साल हिंदी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। इस साल 2026 में यह तिथि 17 जून को पड़ रही है, इसीलिए आज जयंती है। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था जो अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख है, लेकिन राजस्थान सरकार और परंपरागत रूप से यह जयंती हिंदी तिथि के अनुसार मनाई जाती है। यही कारण है कि हर साल अंग्रेजी कैलेंडर में इसकी तारीख बदलती रहती है।

Jayanti Ki Shuruaat: कब से मनाई जा रही है यह जयंती?

महाराणा प्रताप जयंती की परंपरा कोई नई नहीं है। राजपूत समाज और मेवाड़ के लोग सदियों से इस दिन को श्रद्धा और गर्व के साथ मनाते आए हैं। आधुनिक भारत में इसे संगठित रूप देने में राजपूत सभाओं और सांस्कृतिक संगठनों का बड़ा योगदान रहा है। राजस्थान सरकार ने इसे राजकीय उत्सव का दर्जा दिया है और इस दिन सरकारी छुट्टी रहती है। धीरे-धीरे यह जयंती सिर्फ राजस्थान तक सीमित न रहकर पूरे देश में उत्साह के साथ मनाई जाने लगी।

जानकारीविवरण
जयंती 2026 तिथि17 जून 2026 (बुधवार)
हिंदी तिथिज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत 2083
जन्म तिथि (अंग्रेजी)9 मई 1540
जन्म स्थानकुंभलगढ़ किला, राजस्थान
पिता का नाममहाराणा उदय सिंह द्वितीय
माता का नाममहारानी जयवंता बाई सोनगरा
राज्यमेवाड़ (राजस्थान)
प्रमुख युद्धहल्दीघाटी युद्ध — 18 जून 1576
घोड़े का नामचेतक
मृत्यु19 जनवरी 1597, चावंड

Maharana Pratap Ka Janm: कुंभलगढ़ के किले में जन्मा योद्धा

9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में एक ऐसे योद्धा का जन्म हुआ जो आगे चलकर भारतीय इतिहास का सबसे महान स्वाभिमानी शासक बना। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक थे और माता महारानी जयवंता बाई सोनगरा एक वीर राजपूत महिला थीं। महाराणा प्रताप मेवाड़ के 13वें महाराणा थे। उनका पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया था और वे सिसोदिया राजवंश की गौरवशाली परंपरा के सबसे प्रतापी प्रतिनिधि थे।

Data Analysis: महाराणा प्रताप का जीवन — प्रमुख तथ्य एक नज़र में

विषयजानकारी
जन्म स्थानकुंभलगढ़ किला, राजस्थान
राज्याभिषेक1572 ई., गोगुंदा
राजधानीचित्तौड़गढ़ (फिर उदयपुर क्षेत्र)
घोड़े का नामचेतक (नीलवर्ण)
भाले का वज़नलगभग 81 किलोग्राम
कवच + हथियारों का कुल वज़नलगभग 208 किलोग्राम
हल्दीघाटी युद्ध18 जून 1576
विरोधी सेनापतिराजा मान सिंह (मुगल सेना की ओर से)
पत्नीमहारानी अजबदे पँवार (मुख्य पत्नी)
पुत्रअमर सिंह प्रथम
मृत्यु19 जनवरी 1597, चावंड

Haldighati Ka Yudh: इतिहास की सबसे अदम्य लड़ाई

18 जून 1576 — यह वह ऐतिहासिक तारीख है जब हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित हल्दीघाटी की पहाड़ियों में महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की विशाल सेना के बीच यह भीषण संग्राम हुआ। मुगल सेना का नेतृत्व राजा मान सिंह कर रहे थे। महाराणा की सेना संख्या में बहुत कम थी — करीब 20,000 सैनिक मुगलों की 80,000 से अधिक की सेना के सामने थे। फिर भी प्रताप ने ऐसा युद्ध लड़ा कि दुनिया आज भी नतमस्तक है।

Chetak Ki Kahani: वो घोड़ा जो इतिहास बन गया

महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की कहानी भारतीय इतिहास की सबसे भावुक और प्रेरणादायी कहानियों में से एक है। हल्दीघाटी के युद्ध में जब मुगल सेना ने महाराणा को चारों ओर से घेर लिया, चेतक गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अपने स्वामी को युद्धभूमि से दूर सुरक्षित ले गया। एक 26 फुट चौड़े नाले को घायल अवस्था में पार करके चेतक ने महाराणा को बचाया, लेकिन इस वीरतापूर्ण कार्य के कुछ देर बाद ही चेतक ने प्राण त्याग दिए। आज भी हल्दीघाटी में चेतक की समाधि है जहाँ लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

Akbar Se Inkar: जब प्रताप ने झुकने से मना कर दिया

अकबर ने महाराणा प्रताप के पास बार-बार संधि प्रस्ताव भेजे। उसने 4 बड़े दूत — जलाल खान, मान सिंह, भगवंत दास और टोडरमल — को समझौते के लिए भेजा। लेकिन महाराणा प्रताप ने हर बार इनकार किया। उनका एक ही जवाब था — “मेवाड़ की आन-बान-शान से कोई समझौता नहीं।” जब सब राजपूत राजाओं ने मुगलों से संधि कर ली, तब भी प्रताप अडिग रहे। यही उनका स्वाभिमान और शौर्य था जो उन्हें इतिहास में अमर बनाता है।

Jangal Mein Jeevan: घास की रोटियाँ खाईं पर घुटने नहीं टेके

हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप को जंगलों में भटकना पड़ा। उनके परिवार ने अपार कष्ट सहे। कहा जाता है कि घास की रोटियाँ बनाकर खानी पड़ीं, जंगलों में रातें गुजारनी पड़ीं। उनके बच्चे भूखे रहे। लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने मुगलों के आगे सिर नहीं झुकाया। इसी दौरान उनके सच्चे मित्र और भामाशाह ने अपनी सारी संपत्ति — लाखों सोने-चाँदी के सिक्के — महाराणा को सौंप दी ताकि वे नई सेना बना सकें।

Mewar Ki Wapsi: जब प्रताप ने अपना राज्य वापस जीता

भामाशाह की सहायता और भील जनजाति के अडिग समर्थन से महाराणा प्रताप ने नई सेना तैयार की। और फिर शुरू हुआ Mewar की मुक्ति का अभियान। उन्होंने एक-एक करके 36 में से 32 किले और अपने राज्य के अधिकांश हिस्से वापस जीत लिए। केवल चित्तौड़ और मंदलगढ़ ही मुगलों के पास रहे। यह उनकी सैन्य और रणनीतिक प्रतिभा का सबूत था कि उन्होंने उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध अपना राज्य पुनः स्थापित किया।

Maharana Pratap Ka Shastra-Bal: 208 किलो वज़न उठाते थे युद्ध में!

महाराणा प्रताप की शारीरिक शक्ति भी अद्भुत थी। उनके भाले का वज़न लगभग 81 किलोग्राम था। उनके कवच का वज़न 72 किलोग्राम था। ढाल, तलवार और अन्य हथियारों के साथ कुल वज़न लगभग 208 किलोग्राम था जो वे युद्धभूमि में धारण करते थे। उनकी लंबाई 7 फुट 5 इंच बताई जाती है। इसके अलावा उनके साथ हमेशा 2 तलवारें रहती थीं — एक अपने लिए और एक निहत्थे दुश्मन को देने के लिए, क्योंकि वे निहत्थे पर वार नहीं करते थे।

Maharana Pratap Ki Virasat: आज भी जीवित है उनका स्मरण

19 जनवरी 1597 को चावंड में महाराणा प्रताप का निधन हो गया। कहा जाता है कि जब अकबर को यह खबर मिली तो वह भी रो पड़ा। मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी महाराणा प्रताप का नाम स्वाभिमान, देशभक्ति और वीरता का पर्याय बन चुका है। राजस्थान में उदयपुर के पास हल्दीघाटी, कुंभलगढ़ किला और चेतक की समाधि — ये सभी स्थान आज भी लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं।

Conclusion: स्वाभिमान का दूसरा नाम है महाराणा प्रताप!

महाराणा प्रताप सिर्फ एक राजा नहीं थे — वे भारतीय स्वाभिमान, वीरता और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा के प्रतीक हैं। आज 17 जून 2026 को उनकी जयंती पर देशभर में कार्यक्रम हो रहे हैं, जुलूस निकाले जा रहे हैं और उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण हो रहा है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट हों, आत्मसम्मान और अपनी माटी से प्यार कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जय महाराणा प्रताप

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